Q1(a) सामाजिक विघटन के कोई दो कारणों को लिखें |
सामाजिक विघटन के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यहां मैं दो मुख्य कारणों को विस्तार से बता रहा हूँ:
1. आर्थिक असमानता: आर्थिक असमानता एक महत्वपूर्ण सामाजिक विघटन का कारण हो सकती है। जब लोगों के बीच आर्थिक संकट होता है, तो उन्हें मौखिक और शैक्षिक सुविधाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार के मौकों और सामाजिक सुरक्षा के अभाव का सामना करना पड़ता है। यह आर्थिक असमानता विभिन्न सामाजिक वार्षिकों, जातियों, श्रेणियों और क्षेत्रों के बीच असामान्य रूप से विभाजित होती है। इसके परिणामस्वरूप, लोग अपने सामाजिक और आर्थिक स्थिति में निराशा, असहायता और असुरक्षा महसूस कर सकते हैं, जो सामाजिक विघटन का मुख्य कारण बनता है।
2. सामाजिक विभाजन: सामाजिक विभाजन भी सामाजिक विघटन का महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। जब सामाजिक समूहों, जातियों, धर्मों, भाषाओं या सामाजिक वार्षिकों के बीच विभेद बढ़ता है, तो लोगों के बीच सामाजिक विश्लेषण, द्वेष, असंतोष और संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। यह सामाजिक विभाजन वाले मामलों में आपसी अभिप्रेती, आपातकालीनता और संघर्ष से नहीं रहता, जो आरामदायक समाधान के अभाव में सामाजिक विघटन को बढ़ाता है।
ये दो कारण सामाजिक विघटन के पीछे के कुछ मुख्य विभाजनों को प्रकट करते हैं, हालांकि इसके अलावा भी कई अन्य कारण हो सकते हैं जैसे धार्मिक विभाजन, जातीय विभाजन, सामाजिक बुराइयों की मौजूदगी, राजनीतिक संकट, आपसी विवाद आदि।
(b) आत्महत्या को परिभाषित करें।
आत्महत्या एक अत्याधुनिक शब्द है जो किसी व्यक्ति द्वारा उनकी अपनी जान लेने की क्रिया को संकेत करता है। यह एक आत्मविनाशकारी क्रिया होती है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को खत्म करने का निर्णय लेता है और उसका प्रयास करता है। आत्महत्या व्यक्ति के द्वारा उच्च तनिक्त मानसिक दुख, विरह, असहायता, निराशा, रोग, असंतुष्टि या अन्य भावनाओं के कारण होती है।
आत्महत्या को विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है, जैसे अवश्यक औषधों की अधिक मात्रा लेना, घातक गोली या दवा लेना, खुद को जला लेना, जहर पीना, उच्चतम स्थान से गिरना आदि।
यह एक गंभीर मानसिक समस्या है और सामाजिक, प्राकृतिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य के कई कारकों के परिणामस्वरूप हो सकती है। आत्महत्या की अवधारणा एक व्यक्ति के जीवन और उनके प्रियजनों के लिए अत्यंत दुखदायी होती है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
(c) किशोरावस्था की पांच मुख्य समस्याओं की विस्तृत चर्चा करें।
किशोरावस्था या यौवनावस्था एक ऐसा महत्वपूर्ण चरण है जब बच्चाई स्थिति से युवा हो जाती है। इस अवधि में कई मानसिक, शारीरिक और सामाजिक परिवर्तन होते हैं, जिनसे कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। निम्नलिखित हैं कुछ मुख्य किशोरावस्था की सामान्य समस्याएं:
1. हार्मोनल परिवर्तन: किशोरावस्था में युवाओं के शरीर में बड़े परिवर्तन होते हैं, जिनमें हार्मोन्स का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह परिवर्तन शरीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं और कई समस्याएं जैसे मूड स्विंग्स, अवसाद, तनाव, अकांग्रेसिव व्यवहार, निदान और शरीर में तेज गति से बदलती हुई वृद्धि का कारण बन सकती हैं।
2. शारीरिक परिवर्तन: किशोरावस्था में शारीरिक रूप से विकास होता है और यह बच्चों के शरीर में बदलाव लाता है। यह शामिल हो सकता है शरीर के आकार, हाइट, वजन, लिंगांतरण, मासिक धर्म की शुरुआत, वालों और त्वचा में परिवर्तन आदि। ये परिवर्तन युवाओं में आत्मसंवेदन, शर्मिंदगी, स्वार्थपरता और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी मामलों के साथ आनंद और स्वस्थ जीवन शैली के लिए अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
3. मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: किशोरावस्था एक सामान्यतः संवेदनशील और संघर्षपूर्ण समय होता है। यह युवाओं को अस्थिरता, आंतरिक असहजता, स्वार्थपरता, विरोधाभास, मानसिक संकट और अपने आप की पहचान के मुद्दों के साथ आमतौर पर प्रभावित करता है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि अवसाद, चिंता, अंगीकार की कमी, आत्महत्या की भावना, खुद के शरीर पर संकट या नकारात्मक तस्वीर का ध्यान देने की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती हैं।
4. संबंधों की समस्याएं: किशोरावस्था में, संबंधों के मामले में भी कई बदलाव होते हैं। यह मित्रों, परिवार और संबंधों के साथी में परिवर्तन, स्वार्थपरता, विश्वास की कमी, प्रेम संबंधों की प्रभावशालीता में कमी, संघर्ष और विरोध आदि के रूप में दिखा सकता है।
5. शिक्षा और करियर: किशोरावस्था विद्यालय, पठन, प्रशिक्षण और करियर के मामलों में महत्वपूर्ण समय होती है। यह युवाओं को पठन, परीक्षा पर ध्यान देने, नई योजनाओं का चयन करने, संघर्ष करने, समर्पितता और आत्मविश्वास के साथ करियर का निर्माण करने के लिए प्रेरित करती है।
ये समस्याएं किशोरावस्था में सामान्य होती हैं, हालांकि हर व्यक्ति की स्थिति अद्यतित होती है और इसे नजदीकी संबंधित पेशेवर या स्वास्थ्य सेवाओं के साथ समझना चाहिए।
(d) नशे के आदी के कोई दो प्रभावों की व्याख्या करें।
नशा एक गंभीर समस्या है जो एक व्यक्ति को मादक पदार्थों की अभिमुखी बना सकती है, जैसे कि शराब, नशीली दवाएं, तंबाकू और द्रव्यमान पदार्थ। यह आदीबद्धता विकसित कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप नशे का उपयोग नियंत्रण से बाहर हो जाता है और व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है। नशा के द्वारा उत्पन्न होने वाले प्रभाव निम्नलिखित हो सकते हैं:
1. शारीरिक प्रभाव: नशा सेवन करने से शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि शरीर के तंत्रिका प्रणाली का प्रभावित होना, सेहत के कमजोर हो जाना, गंभीर रोगों का विकास, शरीर की वृद्धि और विकास में बाधाएं, श्वसन संबंधी समस्याएं, हृदय रोग, गुर्दे की बीमारियाँ, नसों का क्षति, मोटापा, तंद्रा आदि।
2. मानसिक प्रभाव: नशा मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डाल सकता है। यह बुद्धि को प्रभावित कर सकता है, जिससे मेमोरी और संवेदनशीलता कम हो सकती हैं। यह अवसाद, चिंता, अस्तित्व में त्रुटि, स्वार्थपरता, तनाव, आत्महत्या की भावना, मानसिक विकार और मानसिक संकट को बढ़ा सकता है।
नशा के अतिरिक्त, नशा के आदी को सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक समस्याएं भी प्रभावित कर सकती हैं। यह संबंधों, करियर, वित्तीय स्थिति, शिक्षा, नौकरी के अवसर और सामाजिक सम्मेलनों में संघर्ष और विरोध का कारण बन सकता है।
(e) वैवाहिक हिंसा क्या है?
वैवाहिक हिंसा एक गंभीर समस्या है जो साम्प्रदायिक, सामाजिक और मानसिक स्तर पर पारिवारिक संबंधों में होती है। इसका मतलब होता है कि एक साथी द्वारा दूसरे साथी को हानि पहुंचाने के लिए भारतीय विवाहित पारिवारिक संबंधों में होने वाली यातना और उत्पीड़न है। वैवाहिक हिंसा विभिन्न रूपों में हो सकती है, जिनमें शारीरिक, मानसिक, इमोशनल और आर्थिक हिंसा शामिल हो सकती है।
वैवाहिक हिंसा आमतौर पर पति द्वारा पत्नी के प्रति होती है, लेकिन यह उम्र, जाति, धर्म, शिक्षा स्तर, आर्थिक स्थिति और सामाजिक संदर्भों से प्रभावित हो सकती है। वैवाहिक हिंसा कई रूपों में प्रकट हो सकती है, जैसे कि शारीरिक धक्का-मुक्की, धमकी, मारपीट, शब्दों द्वारा आत्मघाती धमकी, मानसिक और इमोशनल उत्पीड़न, निर्वासन, निगरानी, व्यापारिक हिंसा, आगवानी या दहेज़ के माध्यम से आर्थिक उत्पीड़न।
वैवाहिक हिंसा के परिणामस्वरूप, पीड़ित पार्टनर को शारीरिक, मानसिक और नैतिक क्षति होती है और यह परिवार के सदस्यों, समाज के सदस्यों और सामुदायिक स्तर पर गहरे प्रभाव डालती है। वैवाहिक हिंसा को रोकने और इससे बचाव करने के लिए संबंधित संगठनों, सरकारी नीतियों, कानूनी संरचनाओं और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से कठोरता से काम करना आवश्यक होता है।
(f) वृद्धाश्रम (Old age homes) को परिभाषित करें।
वृद्धाश्रम एक संगठन होता है जो वृद्ध लोगों के निवास की व्यवस्था करता है। यह संस्था वृद्ध व्यक्तियों को सुरक्षित और सुखी रहने के लिए आवास, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक समरंगी संगठन प्रदान करती है। वृद्धाश्रम वे व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं जो अकेलेपन, निराशा या पारिवारिक समर्थन की कमी के कारण अपने घर में नहीं रह सकते हैं या जो स्वतंत्र रूप से एक समर्थन पर्याप्त नहीं कर सकते हैं।
(g) पत्नी दुब्यवहार की धारणा को व्याख्या करें।
पत्नी दुब्यवहार की धारणा एक सामाजिक और मानसिक धारणा है जो कहती है कि पत्नी को अपने पति के साथी के रूप में सदैव वफादार, आदर्शवादी और परिश्रमशील रहना चाहिए। यह धारणा पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित होती है जहां पति को पत्नी की सेवा, सम्मान और प्रेम का पूरा अधिकार माना जाता था। इस धारणा के अनुसार, पत्नी को अपने पति के वचनों का पालन करना चाहिए और उनकी स्वच्छता, खान-पान, घर की देखभाल और परिवार की जरूरतों की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उठानी चाहिए। यह धारणा समाज में परंपरागत रूप से रूपांतरित होती आई है, और वर्तमान में इसे महिला स्वतंत्रता और उच्चतमता के दृष्टिकोण से समीक्षा किया जाता है।
(h) संस्कृति पिछड़ना पर संक्षिप्त नोट दें।
संस्कृति पिछड़ना एक सामाजिक मुद्दा है जिसे सामाजिक विजातीयता, असमानता और अन्याय की स्थिति को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह मुद्दा उन समाजों या समूहों को दर्शाता है जिन्हें उच्च सामाजिक या सांस्कृतिक वर्ग की मान्यता, आदर्श या विभाजन का अनुभव होता है। संस्कृति पिछड़ना सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और न्यायिक अवसरों में असमानता बढ़ा सकता है और सामाजिक समरसता, समानता और सामाजिक न्याय के मानकों के खिलाफ होता है। संस्कृति पिछड़ना को दूर करने के लिए सामाजिक, शैक्षिक और न्यायिक सुधारों की आवश्यकता होती है, जो समानता, सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करते हैं।
(i) भ्रष्टाचार की तीन अवस्थाएं क्या हैं?
भ्रष्टाचार की तीन अवस्थाएं हैं:
1. अवधारणात्मक भ्रष्टाचार: इसमें भ्रष्टाचार संबंधी अवसरों और लाभों की अवधारणाओं का दुरूपयोग करके अपराधियों द्वारा बनाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, नकद रिश्वत लेना या घूस देना, स्थानांतरण और नौकरी में अनुचित प्रभाव डालना आदि।
2. संगठित भ्रष्टाचार: इसमें संगठित समूह या संगठनों के सदस्य अपराधियों द्वारा भ्रष्टाचार के विभिन्न रूपों में सहयोग किया जाता है। इसमें धन, शक्ति और सत्ता का दुरुपयोग, गोपनीयता उल्लंघन, धन धारी अभिभावकों की सेवा करना, जालसाजी, विद्यार्थी चीटिंग, करंट लोटरी साथी विदेशी राजनयिकों को मनोरंजन आदि शामिल हो सकते हैं।
3. नैतिक भ्रष्टाचार: इसमें लोगों के व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों, ईमानदारी, ईमानदारी, और न्यायप्रियता की अवधारणाओं का उल्लंघन किया जाता है। इसमें झूले देना, झूले लेना, खुदाई का काम मानव अधिकार उल्लंघन, व्यवसायिक अपराध, नकदी की गड़बड़ी, औद्योगिक अपराध आदि शामिल हो सकते हैं।
ये तीन अवस्थाएं भ्रष्टाचार के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं, और इनका संगठनिक, नैतिक और व्यक्तिगत स्तर पर प्रभाव होता है।
(i) जातीयता क्या है?
जातीयता एक सामाजिक प्रणाली है जो लोगों को उनकी जाति या जन्म के आधार पर समूहों में विभाजित करती है। इस प्रणाली में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, संसाधनों का उपयोग, सामाजिक प्रतिष्ठा और सामाजिक संरचना के निर्माण में उसकी जाति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। जातीयता आधारित विभाजन में व्यक्तियों को न्यायपूर्वक अधिकार, सुविधाएं और संसाधनों की पहुंच से वंचित कर सकती है और सामाजिक असमानता को बढ़ा सकती है।
Q2. Durkheim के द्वारा दिए आत्महत्या के सिद्धांतों की व्याख्या करें और इनको सामाजिक विघटन से जोड़ें।
ईमिल द्विडी डर्कहाइम, एक प्रसिद्ध सोशियोलॉजिस्ट थे, जिन्होंने आत्महत्या के सिद्धांतों की व्याख्या की थी। उनके अनुसार, सामाजिक संरचना और समाज में संघर्ष या असामंजस के कारण व्यक्तियों को आत्महत्या करने के पीछे की कुछ मुख्य कारण हो सकते हैं।
1. सामाजिक विरोध और असंतुष्टि: दर्कहाइम ने कहा था कि समाज में असंतुष्टि और विरोध से पीड़ित व्यक्ति आत्महत्या कर सकते हैं। जब व्यक्ति को समाज में उचित सम्मान और स्थान नहीं मिलता या उसे सामाजिक रूप से नापसंद किया जाता है, तो वह आत्महत्या के विचार से गुजर सकता है।
2. सामाजिक जटिलता: एक अन्य सिद्धांत के अनुसार, दर्कहाइम ने कहा था कि समाज में जटिल संबंधों के कारण भी व्यक्ति अकेला और असमान महसूस करता है और इससे आत्महत्या करने के विचारों का सामना कर सकता है।
3. सामाजिक असहमति और विसंगति: समाज में विभिन्न समूहों के बीच सामाजिक असहमति और विसंगति से भी व्यक्ति परेशान हो सकता है और आत्महत्या करने के विचारों का सामना कर सकता है। जब समाज में व्यापक विशेषाधिकार, सामाजिक समानता और सहयोग नहीं होता है, तो यह सामाजिक विघटन का कारण बन सकता है।
इस तरह, दर्कहाइम ने सामाजिक संरचना, विरोध, जटिलता, असहमति और विसंगति जैसे कारकों को आत्महत्या सिद्धांतों से जोड़ा है। वे यह मानते थे कि इन सामाजिक प्रावृट्तियों और संकटों के परिणामस्वरूप व्यक्ति भावनात्मक और मानसिक स्थिति में पड़ सकता है, जिससे आत्महत्या का खतरा बढ़ जाता है।
Q3. नशे की लत (Drug addiction) के विभिन्न कारणों और नतीजों का वर्णन करें।
नशे की लत (Drug addiction) एक गंभीर समस्या है जो व्यक्ति को नशीली पदार्थों की आदत में उलझा देती है और उसे उन पदार्थों के बिना स्वस्थ रहने में कठिनाई पहुंचाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं और इसके प्रभाव भी विभिन्न हो सकते हैं।
कारण:
1. सामाजिक दबाव: सामाजिक दबाव, स्थानिकता, प्रेशर, पीर प्रवृत्ति या असामान्य सामाजिक परिस्थितियों के चलते व्यक्ति मद्यासक्ति या नशीले पदार्थों की ओर खींच लिया जा सकता है।
2. मानसिक समस्याएं: डिप्रेशन, अवसाद, तनाव, अनिद्रा या अन्य मानसिक समस्याएं भी व्यक्ति को मद्यासक्ति या नशीले पदार्थों की ओर मोड़ सकती हैं।
3. परिवारिक प्रभाव: परिवार में नशीले पदार्थों का उपयोग करने की प्रवृत्ति, वातावरण, परिवारिक समर्थन या उच्च नशे की उपलब्धता नशे की लत के विकास में योगदान कर सकते हैं।
नतीजे:
1. स्वास्थ्य समस्याएं: नशा स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है, जैसे मानसिक और शारीरिक समस्याएं, न्यूरोलॉजिकल विकार, श्वसन यंत्र और अंतःसंचार प्रणाली की क्षति।
2. सामाजिक समस्याएं: नशास्पद व्यक्ति को सामाजिक और नैतिक मुद्दों, व्यवसायिक असमानता, वित्तीय समस्याएं, और आपत्तिजनक व्यवहार में पड़ सकता है।
3. निर्धारितता की हानि: नशे की लत व्यक्ति के व्यक्तिगत, पेशेवर और आर्थिक जीवन को प्रभावित कर सकती है, जिससे कर्मचारी या छात्र की प्रदर्शन क्षमता और अवसरों की खोज में हानि हो सकती है।
ये कारण और नतीजे एकसाथ मिलकर नशे की लत को सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण समस्या बनाते हैं।
Q4. इनकी व्यख्या करें- 1) भ्रष्टाचार की रोकथाम ii) बच्चों से दुव्यवहार |
1) भ्रष्टाचार की रोकथाम (Prevention of Corruption):
भ्रष्टाचार की रोकथाम का मतलब होता है सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार को रोकने के उपायों और नीतियों की व्यवस्था करना। इसमें सरकारी निकायों और संगठनों में ईमानदारी, पारदर्शिता, जाँच, सजागता, और सजाग समाज को जागरूक करने के माध्यम से भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास किया जाता है। इसमें कानूनी प्रबंधन, जाँच और दण्डाधिकारिता का सुनिश्चित करना शामिल होता है।
2) बच्चों से दुव्यवहार (Child Abuse):
बच्चों से दुव्यवहार उन घटनाओं को दर्शाता है जिनमें बच्चों को भारी रूप से नुकसान पहुंचाया जाता है, चाहे यह शारीरिक, भावनात्मक, या मानसिक रूप से हो। इसमें शामिल हो सकते हैं शारीरिक कसाई, यौन उत्पीड़न, नज़रबंदी, मनोविकार, उत्पीड़न, अनधिकारिक व्यापार, आत्महत्या प्रयास आदि। बच्चों से दुव्यवहार को रोकने के लिए संबंधित कानूनों, नीतियों, और सामाजिक संरचनाओं की व्यवस्था करनी चाहिए, साथ ही शिक्षा, जागरूकता, समर्थन, और संपर्क के माध्यम से बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए संगठनों के प्रयास भी आवश्यक होते हैं।
Q5. भारत में गरीबी को कम करने वाले लागू किए प्रोग्रामों की प्रमुख विशेषताओं की व्याख्या करें।
भारत में गरीबी को कम करने के लिए कई प्रोग्राम और योजनाएं लागू की जाती हैं। इन प्रोग्रामों की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
1) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA):
MGNREGA एक सरकारी रोजगार योजना है जो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान करती है। इसके तहत मजदूरों को 100 दिनों तक काम की गारंटी मिलती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
2) प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY):
PMAY एक आवास योजना है जिसका उद्देश्य गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को सस्ते और आधारित आवास प्रदान करना है। इस योजना के अंतर्गत गरीब परिवारों को घर बनाने के लिए वित्तीय सहायता और सब्सिडी प्रदान की जाती है।
3) राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (Ayushman Bharat):
Ayushman Bharat एक व्यापक स्वास्थ्य योजना है जिसका लक्ष्य गरीब परिवारों को उच्च-स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करना है। इस योजना के तहत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) के माध्यम से गरीब परिवारों को नि:शुल्क चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।
4) अन्नपूर्णा योजना:
अन्नपूर्णा योजना एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य है गरीब और भूखे लोगों को वाणिज्यिक मानदंडों के तहत खाद्यान्न उपलब्ध कराना। इस योजना के अंतर्गत गरीब लोगों को प्रतिदिन निशुल्क अन्नपूर्णा राशि प्रदान की जाती है।
5) सुरक्षा और कल्याण के अधिकारी (Saksham):
Saksham एक सरकारी योजना है जिसका उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को सामरिक और आर्थिक रूप से सशक्त करना है। इस योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता, कौशल विकास, रोजगार योजनाएं, और प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान किए जाते हैं।
ये प्रमुख योजनाएं गरीबी कम करने के लिए सरकार के द्वारा अभियांत्रित की जाती हैं और गरीब लोगों को आर्थिक सुरक्षा, रोजगार, आवास, चिकित्सा सुविधाएं, और उनके सामरिक विकास की सुविधा प्रदान करने में मदद करती हैं।
Q6. बजुर्ग ( Old age) के विभिन्न आयामों की व्याख्या करें।
बजुर्ग या वृद्धावस्था के विभिन्न आयाम निम्नलिखित हैं:
1) शारीरिक आयाम:
शारीरिक आयाम में वृद्ध वयस्कों के शारीरिक स्वास्थ्य, कमजोरी, स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता, रोगों का सामना, और शारीरिक गतिविधियों की समर्थता शामिल होती है। वृद्धावस्था में शारीरिक क्षमता में कमी हो सकती है और बजुर्ग व्यक्ति को विशेष स्वास्थ्य देखभाल और समर्थन की आवश्यकता होती है।
2) मानसिक आयाम:
मानसिक आयाम में वृद्ध वयस्कों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संबंध, सामाजिक अलगाव, और मनोरंजन की समर्थता शामिल होती है। वृद्धावस्था में अकेलापन, तनाव, डिप्रेशन, और मानसिक तनाव के मुद्दे सामान्य होते हैं और इसके साथ-साथ मनोरंजन की आवश्यकता भी हो सकती है।
3) आर्थिक आयाम:
आर्थिक आयाम में वृद्ध वयस्कों की आर्थिक स्थिति, पेंशन, नियंत्रित खर्च, विभिन्न सरकारी योजनाएं और समर्थन की व्यवस्था शामिल होती है। बजुर्ग व्यक्ति की आर्थिक सुरक्षा और आयोग्यता उनकी सामग्री आवश्यकताओं की पूर्ति करने में मदद करती है।
4) सामाजिक आयाम:
सामाजिक आयाम में वृद्ध वयस्कों के सामाजिक सम्बंध, परिवार का समर्थन, समाजिक उपस्थिति, और सामुदायिक सहभागिता शामिल होती है। वृद्धावस्था में सामाजिक उदासीनता, समाजिक अलगाव, और सम्प्रेषण की समस्याएं सामान्य हो सकती हैं, और इसलिए सामाजिक समर्थन और समुदाय का समर्थन महत्वपूर्ण होता है।
ये आयाम वृद्ध वयस्कों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करते हैं और उन्हें समर्थन और सुविधाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करते हैं।
Q7. परिवार हिंसा की अवधारणा पर रोशनी डालें।
परिवार हिंसा के रूप में जानी जाने वाली अवधारणा एक सामाजिक मुद्दा है जहां परिवार के सदस्यों के बीच शारीरिक, मानसिक, या आत्मिक रूप से हिंसा होती है। यह रूपांतरण शारीरिक धक्के, मारपीट, अपमान, आत्महत्या या अन्य तरीकों के माध्यम से हो सकता है। परिवार हिंसा एक संघर्षपूर्ण स्थिति होती है जहां एक या अधिक सदस्यों की नियंत्रण, सत्ता, या अधिकार की प्रतिस्पर्धा के कारण हिंसा का संक्रमण होता है। इसे शारीरिक या मनोवैज्ञानिक तौर पर कठिनाइयों, आर्थिक स्थितियों, सामाजिक प्रतिस्पर्धा या परिवारिक समस्याओं के कारण भी किया जा सकता है। परिवार हिंसा को गंभीर समस्या के रूप में मान्यता दी जाती है और इसे रोकने और इसके पीछे के कारणों का समाधान करने के लिए कड़ी प्रयास किए जाते हैं।
Q8. कार्य स्थानों पर तंग करने की समस्या का वर्णन करें।
कार्यस्थानों पर तनाव की समस्या आधुनिक जीवनशैली में एक मामूली लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह एक प्रकार का मानसिक तनाव है जो किसी व्यक्ति को उनके कार्यस्थान पर असुविधा और तकलीफ महसूस कराता है। कार्यस्थानों पर तनाव के कारण शामिल हो सकते हैं:
1) काम का दबाव: बढ़ते काम का दबाव और काम की अतिरिक्त भारी लोड व्यक्ति को तनावपूर्ण बना सकता है। अनुमानित कार्यकाल, समय की कमी और अपेक्षित परिणामों की दबाव काम के तनाव का कारण बन सकते हैं।
2) संगठनात्मक समस्याएं: कार्यस्थान पर कम समर्थन, अस्पष्ट मार्गदर्शन, अच्छी संगठनात्मक योजना की कमी, और कर्मचारियों के बीच संघर्ष की स्थिति कार्यस्थान में तनाव का कारण बन सकती हैं।
3) कर्मचारी के संबंधों की समस्याएं: विभिन्न संबंधों की कमजोरी, कार्यसंबंधी संघर्ष, टीम के बीच असामंजस्य या द्वन्द्व, और बातचीत की कमी कार्यस्थान में तनावपूर्ण माहौल पैदा कर सकती हैं।
4) कर्मचारी की सुरक्षा और स्वास्थ्य: अनुकूल नहीं सुरक्षा सुविधाएं, शारीरिक और मानसिक तनाव के कारक बन सकती हैं। इसमें उच्च शोर, अशुद्ध वातावरण, दबावपूर्ण नीतियां, अनुचित काम अवधि और अस्थायी कर्मचारी की स्वास्थ्य सुरक्षा सुविधाओं की कमी शामिल हो सकती हैं।
कार्यस्थानों पर तनाव की समस्या कार्यभार, कार्यकाल, संगठनात्मक समस्याएं और कर्मचारी के संबंधों की समस्याओं से जुड़ी होती हैं। यह तनाव कर्मचारियों की संतुष्टि, कार्य प्रदर्शन, और आमिरिता पर असर डाल सकती है, इसलिए संगठनों को इस समस्या का समाधान करने के लिए उचित नीतियों, समर्थन संरचनाओं, और सक्रिय निगरानी के बारे में विचार करना चाहिए।
Q9. सामाजिक विघटन से आपका क्या भाव है? सामाजिक विघटन की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करें।
सामाजिक विघटन के विषय में मेरा भाव गहरा है और यह एक चिंता का विषय है। समाज में विघटन उस समय होता है जब लोगों के बीच संघर्ष, विरोध, असमंजस, और असमानता विकसित होती है। यह समाज के सुख-दुख को प्रभावित करता है और सभी के जीवन पर असर डालता है।
सामाजिक विघटन की विभिन्न विशेषताएं:
1) सामाजिक असमानता: एक समाज में जाति, धर्म, जनजाति, लिंग, रंग, या आर्थिक स्थिति के आधार पर विभाजित होने से असमानता उत्पन्न हो सकती है। यह सामाजिक विघटन का मुख्य कारण है।
2) धार्मिक और सांस्कृतिक विभेद: धार्मिक और सांस्कृतिक मामूले भी सामाजिक विघटन का कारण बनते हैं। भाषा, धर्म, रीति-रिवाजों, और संस्कृति के बीच विवाद समाज को विभाजित कर सकते हैं।
3) राजनीतिक और आर्थिक विघटन: राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे समाज को विभाजित कर सकते हैं। शक्ति का अधिकार और धन के बंटवारे में असमानता होने से विघटन होता है।
4) जाति और कास्ट संबंधी विभेद: जाति और कास्ट संबंधी विभेद भी सामाजिक विघटन का कारण बनते हैं। अन्यायपूर्ण व्यवस्था, जातिवाद, और कास्ट के आधार पर अनुचित भागीदारी की स्थिति में विघटन हो सकता है।
ये विशेषताएं सामाजिक विघटन का अस्तित्व और प्रभाव समझने में मदद करती हैं। सामाजिक विघटन के प्रभावों से निपटने के लिए सामाजिक न्याय, अधिकारों का समान वितरण, शिक्षा, संघर्षों के समाधान, और सामाजिक समरसता को प्रबल करने की आवश्यकता होती है।
Q10. अपराध (delinquency) से आपका क्या भाव है? अपराध के लिए योगदान देने वाले कारकों की चर्चा करें।
अपराध (delinquency) से मेरा भाव नकारात्मक है, क्योंकि यह समाज के न्याय और सुरक्षा प्रणाली को खतरे में डालता है और लोगों के जीवन पर असर डालता है। अपराध एक व्यक्ति या समूह द्वारा किये जाने वाले गलत कार्यों को संकेत करता है जिनसे कानून तथा सामाजिक नियमों का उल्लंघन होता है।
अपराध के लिए योगदान देने वाले कारकों में कई तत्व शामिल हो सकते हैं:
1) आर्थिक परिस्थितियाँ: आर्थिक समस्याएं जैसे गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असंतुलन आदि अपराध करने के प्रमुख कारण हो सकती हैं। आर्थिक संकट के चलते लोग अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अवैध मार्गों का चुनाव कर सकते हैं।
2) सामाजिक परिस्थितियाँ: सामाजिक बाधाओं, विपरीत प्रभावी परिवार संरचना, अशिक्षा, विशेष अधिकारों की अनुपस्थिति आदि अपराध करने के प्रमुख कारण हो सकती हैं। सामाजिक परिस्थितियाँ व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने से रोक सकती हैं और उन्हें अपराध में धकेल सकती हैं।
3) मानसिक स्वास्थ्य: मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे मनोरोग, अवसाद, उत्पीड़न, स्ट्रेस आदि व्यक्ति को अपराध करने की ओर धकेल सकती हैं। मानसिक तनाव और आंशिकता के कारण व्यक्ति अपनी सामाजिक सहभागिता खो सकता है और अपराध करने की प्रवृत्ति बढ़ा सकती है।
ये तत्व अपराध करने वाले कारकों की व्याख्या करते हैं, हालांकि हर अपराध की पीछे की ये वजहें एकसंग नहीं होती हैं और यह अपराध के प्रकार और स्थितियों पर भी निर्भर करती हैं। अपराध को कम करने के लिए शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं, और सशक्त कानूनी प्रणाली के प्रभावी उपयोग की आवश्यकता होती है।
Q11. नैतिक विरोध परिस्थितियों की साधारण विशेषताएं क्या हैं?
नैतिक विरोध परिस्थितियों की कुछ साधारण विशेषताएं निम्नलिखित हो सकती हैं:
1) भागीदारी के बाधापूर्ण होने की स्थिति: नैतिक विरोध परिस्थितियों में, व्यक्ति को दो या अधिक मूल्यों, मान्यताओं, या नियमों के बीच चुनौती आती है, जो एक दूसरे के विपरीत हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति अपने कार्यों या निर्णयों के माध्यम से एक मूल्य को उचित मानते हैं, जबकि दूसरे मूल्य के साथ विरोधी हो सकते हैं।
2) अनिश्चितता और असुरक्षा: नैतिक विरोध परिस्थितियों में, व्यक्ति को कार्यों या निर्णयों के परिणामों के बारे में अनिश्चितता और असुरक्षा का अनुभव हो सकता है। यह स्थिति व्यक्ति को समझने में कठिनाई पहुंचा सकती है कि कौनसा कार्य या निर्णय नैतिक दृष्टिकोण से सही है और किसे उचित माना जाए।
3) बाधाओं और विरोधों की प्रतिक्रिया: नैतिक विरोध परिस्थितियों में, व्यक्ति को अनुचित या नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से निपटने की आवश्यकता हो सकती है। जब एक व्यक्ति नैतिक दृष्टिकोण से सही माना जाने वाले कार्य करता है, तो वह आमतौर पर समाजिक विरोध या संघर्ष का सामना कर सकता है। इसके साथ ही, उनके विचारों और कार्यों को भी समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता है और यह उन्हें अलग या अस्वीकृत महसूस करा सकता है।
ये विशेषताएं नैतिक विरोध परिस्थितियों के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, और नैतिक पहलुओं को प्रभावित करती हैं। व्यक्ति को स्वयं के नैतिक मान्यताओं और सामाजिक संरचनाओं के साथ संघर्ष करने की जरूरत हो सकती है, जो उनके नैतिक विकास पर प्रभाव डालती हैं।
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